एक शाम शानी की यादों के नाम


फ़ीरोज़ शानी: डॉ. एडवर्ड जे का भारत और शानी के साथ 50 के दशक से संबंध रहा। आपने आपके पति डॉ. जे से शानी का नाम किस तरह सुना…आपके ज़हन में शानी की क्या तस्वीर उभरी थी?

शेरॉन जे: एडवर्ड शानी के बारे में कुछ कह रहे हों, ऐसा कुछ मुझे याद नहीं। पहले जब हम मिले थे तब वह अक़्सर भारत में अपने शोध के बारे में बताया करते थे और ये भी कि शानी नाम का एक शख़्स है जिसने उनकी बहुत मदद की। वह बताया करते थे कि शानी हिंदी के प्रसिद्ध लेखक हैं हालंकि मुसलमान हैं। मैं बमुश्किल 20 साल की थी और मुजे नहीं मालूम था कि भारत में सब लोग एक ही भाषा नहीं बोलते। मुझे इस्लाम और भारत के बारे में कोई जानकारी नही थी। मैं अगर 47 साल पीछे जाऊं तो  मुझे याद पड़ता है एडवर्ड का बस्तर के बारे में बताना जब वह अपनी पहली पत्नी फ़िलिस के साथ भारत गए थे और ये कि किस तरह एक दिन जब वे जा रहे थे तो सामने से शानी साइकिल पर आ रहे थे….शानी ने साइकिल रोकी और कहा: ‘’आप ज़रुर डॉ. एडवर्ड जे होंगे…?’’

एडवर्ड जे: डॉ. नहीं, सिर्फ एडवर्ड जे…

 ‘’शाम की बैठकें, चर्चे और झगड़े’’

शेरॉन जे: ….और एक बात जो मुझे याद है वो है एडवर्ड का 1967-69 में रायपुर में चार्म हाउस में बिताए दिनों का ज़िक्र करना। मैं तब एडवर्ड से नहीं मिली थी, मैं इस दौरे के बाद ही मिली थी। वह शानी के परिवार, उनके तीन बच्चों और पत्नी के बारे बताया करते थे। शायद वहां कोई बाल्कनी थी या इसी तरह की कोई जगह जहां वे रोज़ शाम को बैठकर विभिन्न मुद्दों पर चर्चा किया करते थे और अक्सर ये चर्चाएं झगड़े में बदल जाया करती थी…

एडवर्ड जे: रायपुर में नही, रायपुर के पास पारागांव में होता था….

फ़ीरोज़ शानी: झगड़े की वजह क्या होती थी?

एडवर्ड जे: मुझे याद नही…मालूम नहीं। ज़्यादातर समय हम एक दूसरे से सहमत होते थे लेकिन लेकिन वह मुझसे अमेरिका, महिलाओं तथा राजनीति से संबंधित कई सवाल करते थे और फिर इसको भारत से जोड़कर देखते थे और तभी हम दोनों में गरमा गरम बहस हो जाती थी जो कभी-कभी झगड़े में भी तब्दील हो जाती थी लेकिन सही मायने में झगड़ा नहीं।

फ़ीरोज़ शानी: भारतीय समाज को दकियनूसी माना जाता रहा है हालंकि पिछले कुछ सालों में इसमें बदलाव भी आएं हैं। शानी का ताअल्लुक एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार से था जो और भी ज़्यादा दकिनूसी माना जाता है। क्या आपको शानी वाक़ई दकियानूसी लगे?

एडवर्ड जे: बिल्कुल नही, बल्कि उन्हें आधुनिक होने पर फ़ख़्र था। वो अपने दकियानूसी दोस्तों का मज़ाक उड़ाया करते थे। वो उनसे ‘’ज़रा मॉर्डन बनने’’ को कहते थे।

                    “भारतीय महिलाओं की दशा देखकर मैं दंग रह गई

शेरॉन जे: …मैं यहां कुछ कहना चाहूंगी। इन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा कि शानी आधुनिक थे या दकियानूसी। मैं 21 साल की थी जब पहली बार भारत आई और यहां महिलाओं के साथ जैसे बर्ताव होता है, उसे देखकर दंग रह गई। भोपाल के साउथ टी.टी. नगर के घर में, जहां शानी अपने परिवार के साथ रहते थे, जो मैंने देखा वो मेरे लिए बहुत हैरत करने वाला था। बाहर एक ख़ूबसूरत लॉन था जहां हम बैछकर बातें किया करते थे। इस बैठक में तमाम पुरुषों के बीच मैं ही एक अकेली महिला होती थी। और अगर कोई महिला आ भी जाए तो वह भीतर शानी की पत्नी सलमा के साथ रसोईघर में चली जाती थी। और मैं सोचती थी, ‘’ये क्या बात हुई…।“  मेरा मतलब है कि इन महिलाओं को हमारे साथ बैठकर बातचीत में हिस्सा लेना चाहिये न कि सिर्फ़ रसोई से खानेपीने का सामान लाना। मुझे पता नहीं था कि मुझे क्या करना चाहिये क्योंकि ये सब अमेरिका से एकदम अलग था। शानी जब भी हमें अपने घर ले जाते थे तो वहां मैं, मेरे पति और अन्य पुरुष होते थे। महिलाएं भी होती थी लेकिन अंदर किसी कमरे में या फिर रसोईघर में। फिर एक दिन मैं उठी, अपना सिर ढका और अंदर चली गई, उन महिलाओं के पास। मुझे हिंदी नही आती थी लेकिन मैं बस हेलो कहकर उनके साथ कुछ मिनट बिताने की कोशिश करती थी। हम लोगों में कुछ भी कॉमन नही था, कुछ भी कहने को नही था लेकिन फिर भी मुझे लगा कि उनके साथ, कुछ देर ही सही, समय बिताना ज़रुरी है।

एडवर्ड जे: मैं तुम्हें भारतीय महिलाओं की दशा के तुम्हारे मुख्य विषय से भटकाना नही चाहता लेकिन इसका एक बड़ा कारण भाषा भी थी। सलमा को अंग्रेज़ी नहीं आती थी और हम लोग ज़्यादातर अंग्रेज़ी में ही बात करते थे।

शेरॉन जे: मुझे नहीं लगता कि भाषा कोई समस्या थी, इसका संबंध एक ऐसे रुढ़ीवादी समाज से था जिसे महिलाओं को बाहर रसाईघर से बाहर निकालने की ज़रुरत थी।

     ‘’मुझे शानी से क्या अपेक्षा थी….? पता नही, मैं इतनी मैच्यौर नही थी ‘’

फ़ीरोज़ शानी: जब आप भारत आईं तो क्या आपने शानी को वैसा ही पाया जैसा सोचा था?

शेरॉन जे: मैंने उन्हें किसी रुप विशेष में पाया हो ये मैं कह नहीं सकती क्योंकि इस बारे में मैंने कुछ सोचा ही नही था। मुझे भारत और भारतीय समाज के बारे में कुछ भी पता नही था। मुझे बस इतना मालूम था कि शानी बुद्धिजीवी हैं, मशहूर लेखक हैं। इस मायने में जो मैंने सोचा था वो मैंने देखा.. भोपाल के साउथ टी.टी. नगर के घर में  शाम को साहित्यिक बहसें, किताबों पर बातचीत वग़ैरह वग़ैरह। लेकिन शानी को लेकर और कुछ…..पता नही…मैं इतनी सयानी नहीं थी।

 ‘’शानी की वजह से ही मैं कई ऐसे हालातों से रुबरु हुईं जो ज़्यादातर लोग नहीं हो पाए’’

परवेज़ अहमद: आप हिंदुस्तान बहुत घूमी हैं। इस देश को जानने-समझने में शानी कितने मददगार रहे?

शेरॉन जे: बहुत…दोनों (शानी, जे) ने मुझे इस देश के बारे में अलग-अलग नज़रिया दिया। शानी की वजह से ही मैं कई ऐसे हालातों से रुबरु हुईं जो ज़्यादातर लोग नहीं हो पाए…मतलब कॉलेज जैसा माहौल, बुद्धीजीवी, उनकी साहित्यिक चर्चाएं। इन सब बातों से मुझे भारत को समझने में मदद मिली। मुझे तब भी लगता था कि भारतI रुढ़ीवादी देश है, जिसके लिए ज़ाहिर है, मैं तैयार नही थी लेकिन यहां रहने के दौरान हम इतने गहरे दोस्त बन गए कि मैं बहुत सहजता के साथ कोई भी सवाल उनसे कर लिया करती थी। अमूमन न सवालों का संबंध भारतीय महिलाओं की स्थिति, शादी-ब्याह के रीति रिवाज, घर का रखरखाव, पर्सनल ग्रूमिंग से होता था। उन्होंने मुझे समाज के विभिन्न तबको के लोगों से मिलाया।

             ‘’ये मेरा देश है, मेरी संस्कृति है, मुझे मत समझाओ कैसे घर चलाना है’’

एडवर्ड जे: …एक बात मुझे याद है और वो ये कि जब तुमने सलमा को भी महफ़िल में शामिल करने का मसला उठाया था, शानी भड़क गए थे…सलमा के पर्ति उनका व्यवहार तुम्हें पसंद नही था…

शेरॉन जे: बिल्कुल नहीं…

एडवर्ड जे: …वह इन बातों से झुंझला जाते थे और कहते थे- ‘’मेरा देश है, मेरी संस्कृति है और हम इसी तरह से रहते हैं..घर कैसे चलाना है मुझे मत सिखाओ….।‘’

शेरॉन जे: हां..मैं भी इसका ज़िक्र करने वाली थी। अगर हम सिर्फ़ चार लोग साथ होते थे तो अलग बात होती थी लेकिन जब ग्रुप, जिसे मैं भोपाल का बुद्धीजीवी ग्रुप कहती थी, होता था तो बात एकदम अलग हो जाती थी। इस बुद्धीजीवी ग्रुप की बैठक में सलमा के शामिल होने की मैं अपेक्षा न हीं करती थी लेकिन जब हम चार लोग बैठते थे तो वो क्यों नही शामिल हो सकती थी…हम कोई जटिल चर्चा तो नहीं करते थे…

एडवर्ड जे:…तुम्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था जिस तरह से वह सलमा को ये लाओ, वो लाओ का आदेश देते थे…

शेरॉन जे: लेकिन आख़िरकार मैंने सलमा को रसोईघर से बाहर निकाल ही लिया और शानी को मानना पड़ा।  मैंने एक दिन सलमा से पूछा, ‘’क्या ड्रिंक लोगी?’’ मैंने सलमा से बातचीत का ज़रिया निकाल लिया था…संकेतों की भाषा या आप इसे जजो भी कहें। तो मैंने सलमा को ड्रिंक दी, उन्होंने पी और हम सबने इंजॉय किया।

          ‘’मैं हैरान थी कि एक मुसलमान हिंदू धर्म के बारे में इतना कुछ जानता है’’

फ़ीरोज़ शानी: शानी बहुत आवेगशील थे….गहरी पसंद, नापसंद रखने वाले। क्या आप दोनों शानी के इस पहलू पर रौशनी डाल सकते हैं…?

एडवर्ड जे: शानी के बारे में शुरु से ही जो बात मुझे अच्छी लगी वो ये थी कि वह बिल्कुल भी लालची नही थे। उन्होंने कभी भी ऐसे बर्ताव नही किया कि मानो मैं कोई अजीब शख़्स हूं….उन्होंने बराबरी से बर्ताव किया. मैंने उनसे कहा कि मुझे बस एड बवलाया करो, साहब बुलाने की ज़रुरत नही है और वह फ़ौरन मान गए। इस मायने में वह बहुत आधुनिक थे, बहुत सहजता के साथ वह एक अमेरिकी के साथ घुलमिल गए।

 ‘’मुसलमान होने के बावजूद वह हिंदू धर्म के बारे में इतना जानते थे जितना कि कोई हिंदू, जिससे मैं मिली, नही जानता था’’

शेरॉन जे: मैं एडवर्ड की हर बात से सहमत हूं। ये शानी के व्यक्तित्व के सबसे सशक्त  पहलुओं में एक था। अब जब मैं पीछे पलट के देखती हूं तो पाती हूं कि एक मुस्लिम होते हुए भी उन्हें हिंदू धर्म के बारे उन्हें इतनी जानकारी थी जितनी की किसी हिंदू को, जिसे मैं जानती हूं, इस्लाम धर्म के बारे में नही होती। मुझे हैरानी होती थी जब कोई हिंदू इस्लाम के बारे में ये बात या वो बात करता था और मैं उनकी तरफ देखकर मानो कहती थी…’’आप गंभीर नही हैं…ये बात तो प्रासंगिक भी नही है।‘’

परवेज़ अहमद: क्या आपको उनके लेखन में उनकी ज़ाती जिंदगी की जलक दिखी?

शेरॉन जे: कहना मुश्किल है। मुझे याद है जब दिरा गांधी की हत्या हुई थी, वह मयूर विहार में रहते थे। दंगे भड़क गए थे। वह दंगों से बचाने के लिए एक सरदार जी को अपने घर में पनाह देना चाहते थे लेकिन सलमा इसके ख़िलाफ़ थीं। अगर मेरी यादाश्त सही है इस पर  उन्होंने कोई कहानी लिखी थी जिसका शायद कभी अंग्रेज़ी में अनुवाद नही हुआ। शानी और एडवर्ड या मैं और शानी अक़्सर उनके लेखन और ज़िंदगी के बारे में चर्चा किया करते थे। एडवर्ड ने मुझे शानी के पिता के बारे में बताया, ये भी कि कैसे शानी की शादी हुई और कई बातें बस्तर के बारे में। तो मुझे लगता है कि इन सबका प्रभाव उनकी सोच पर ज़रुर हुआ होगा लेकिन उनके लेखन में ये कितना आया, ये मै कह  नही सकती।

         ‘’काला जल शानी की आत्मकथा ही है’’

एडवर्ड जे: मुझे लगता है कि काला जल एक तरह से शानी की आत्मकथा ही है, ये उनके निजी जीवन का हिस्सा है। मैंने उनकी कहानियों के कुछ अंग्रेज़ी अनुवाद पढ़े हैं और पाया कि इनमें वही सब कुछ है जिनके बारे में वो बात किया करते थे। उनकी कहानियां जीवन के बहुत क़रीब थी।

फ़ीरोज़ शानी: आप, ख़ासकर एडवर्ड जे, काफी समय से हिंदुस्तान आ रहे हैं और शानी को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। शैरॉन जी, आप जब यहां अमेरिकी दूतावास में पढ़ा रही थी, आपको उनके साथ काफी समय गुज़ारने का मौक़ा मिला। क्या आप शानी के व्यक्तित्व के किसी ऐसे पहलू को बता सकती हैं जिसके बारे में आप कह सकें, ‘’ओह, ये तो मैं जानती ही नही थी।‘’

  ‘’पता नही था कि शानी इतने ग़ुस्सैल हैं’’

शेरॉन जे: मुझे लगता है…जब मैं रोज़वुड अपार्टमेंट में ही रह रही थी, तब एक अमेरिकी स्कूल में पढ़ाती थी। उस दौरान शानी को और क़रीब से जानने का मौक़ा मिला जो भोपाल में एडवर्ड के साथ रहते नहीं मिल सका था। इस दौरान 91991-1995) मैं शानी के परिवार के और नज़दीक आई। मुझे क़ती ग़ुमान न था कि शानी इतना ग़ुस्सैल भी हो सकते हैं। समाचार अपार्टमेंट में मैंने उनका ये रुप एक बार देखा था और मैं घबरा गई थी..मुझे नहीं पता ता कि उनका पारा इतना चढ़ सकता है।

एडवर्ड जे: ये अजीब बात है….मुझे याद नही कि मैनें शानी को कभी ग़ुस्सा होते या हिंसक होते देखा हो। उनकी जल्दी से विफरने की छवि ज़रुर थी लेकिन मैंने उन्हें विफरते कम ही देखा…हो सकता है ये इसलिये कि हमारी बहुत पटती थी…।

शेरॉन जे: मैं ये नहीं कह रही कि ऐसा अक़्सर होता था क्योंकि कुलमिलाकर वह बेहद उदार और यारबाश इंसान थे। वह पानवाले से रिक्शेवाले से बात किया करते थे। कभी-कभी जब हम साहित्य अकादमी से वापस घर मयूर विहार लौट रहे होते थे तो वह रिक्शेवाले से बात करने लगेंगे और मैं कहती थी, ‘’ हमें रिक्शेवाले के पूरे जीवन की पड़ताल करने की ज़रुरत नही है, हमें घर जाना है।’’ लेकिन वह रिक्शेवाले और पानवाले के जीवन को करीब से जानना चाहते थे।

           ‘’हिंदू सहित हिंदी भाषियों तक पुंचने के लिए उन्होंने हिंदी में लिखना चुना’’

फ़ीरोज़ शानी: शानी उन चंद हिंदी लेखकों में हैं जिन्होंने भारतीय मुसलमानों के बारे में लिखा। कुछ कहानियों के छपने के बाद उन पर सांप्रदायिक होने का तमग़ा लगा दिया गया जिसके ख़िलाफ़ वह मरते दम तक लड़ते रहे।

शेरॉन जे: मुझे नहीं लगता…पता नही ऐसा क्यों किया गया।

एडवर्ड जे: हिंदू सारा वक़्त उनके घर आते रहते थे…शानी उनके साथ साहित्य और वैश्विक विषयों पर चर्चा किया करते थे। हां, वह कभी-कभी हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में हिंदू-धर्म का मज़ाक उड़ा दिया करते थे लेकिन उन्होंने कभी हिंदू-धर्म से नफ़रत नहीं की। उनके बहुत से हिंदू दोस्त थे और वह हिंदू लेखकों का बहुत सम्मान करते थे। बल्कि उन्होंने हिंदी में लिखना इसलिए चुना ताकि हिंदू सहित ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक पहुंच सकें। मुसलमान होने की वजह से उन्हे किराये पर गर मिलने में दिक़्क़त होती थी और इस भेदभाव से वह आहत भी होते थे लेकिन उन्होंने हिंदुओं से कभी नफ़रत नही की।

फ़ीरोज़ शानी: हिंदू-मुस्लिम, राष्ट्रवाद और देशभक्ति से मुझे याद आया, शानी अक़्सर ये तर्क दिया करते थे, ‘’मेरे पास पाकिस्तान जाने का विकल्प था लेकिन मैंने भारत को चुना और इस तरह मैं आपसे कहीं ज़्यादा देशभक्त और राष्ट्रवादी हूं।‘’

शेरॉन जे: मुझे याद है, जब हम भारत और पाकिस्तान के बारे बात करते थे तब वह हमेशा कहते थे, ‘’मैं पहले भारतीय हूं।‘’ एडवर्ड ने ठीक कहा। उन्होंने हिंदी में लिखना इसलिये चुना ताकि वह मुस्लिम विषयों के साथ ज़्यादा से ज्यादा हिंदू पाठकों के पास पहुंच सकें

  ‘’उन्हें डर था कि वह भुला दिये जाएंगे’’

फ़ीरोज़ शानी: अगर शानी आज ज़िंदा रहते तो आप उनसे क्या कहते?

शेरॉन जे: मैं उनके स्वास्थ्य के बारे में बात करती। उन्हें डायबिटिज थी। डॉक्टर से मिलकर लौटने प वह अक्सर अपसेट रहते थे। अपसेट सलिए कि उन्हें लगता था कि डॉक्टर ने उनकी इज्जत नहीं की। इसपर मेरा जवाब होता कि आप वहां अपने इलाज के लिए जाते हैं और बाक़ी चीजों का कोई लेना-देना नहीं है। मुझे लगता है कि वह थोड़ा जल्दी चले गए क्योंकि वह इस हकीकत को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें डायबिटिज है और इसके लिए उन्हें कुछ चीजों से परहेज करने की जरूरत है। सलमा उनके लिए सही भोजन बनातीं तो वह कहते कि मैं इसे नहीं खा सकता क्योंकि इसमें नमक नहीं है। वह इसी तरह की बातें करते रहते थे। इस तरह के बदलावों के साथ जीवन को ढालना शायद उनकी जिंदगी का सबसे कठिन संघर्ष था। एक जवान व्यक्ति के रूप में बंटवारे और उससे आए बदलावों के साथ निबाह कर लेना आसान था लेकिन अपने जीवन के आखिरी सालों में, खासकर रिटायरमेंट के बाद यह मुश्किल हो गया था। इन सब चीजों से निपट पाना उनके लिए तकलीफ़देह हो गया था। इस दौर में उन्होंने अपने आसपास के लोगों को पागल बना दिया था।

एडवर्ड जे: हमारी शुरुआती मुलाकातों में मैंने उन्हें बताया था कि मेरे परिवार में डायबिटिज का इतिहास रहा है और इसलिए मैं परहेज करता हूं, कसरत करता हूं और नियमित तौर पर मेडिकल चेकअप आदि कराता रहता हूं। उन्होंने अपने कंधे उचकाते हुए कहा था, ‘मेरे कई दोस्त हैं जिन्हें डायबिटिज है फिर भी वे चावल की बजाय चपाती खाते हैं।’ तो दुर्भाग्य से शानी का दृष्टिकोण कुछ इस तरह का था। वह कहा करते थे, ‘मैं अपनी जिंदगी जीना चाहता हूं, मैं इसका आनंद लेना चाहता हूं, मैं एक लंबी, बुरी जिंदगी से ज्यादा खुशियों भरी एक छोटी जिंदगी जीना ज्यादा पसंद करूंगा।’

शेरॉन जे: लेकिन मुझे लगता है कि इस दृष्टिकोण का एक हिस्सा उनके रिटायरमेंट के बाद आया था। शानी को जब रिटायरमेंट के लिए मजबूर किया गया तो उनमें काफी तेजी से बदलाव आया था। वह डिप्रेशन में थे और उन्हें लगता था कि वह साहित्यिक बिरादरी से दूर हो गए हैं और उन्हें भुला दिया जाएगा। उन्होंने मुझसे सीधे तौर पर यह बात नहीं कही लेकिन मैं महसूस कर सकती थी।

 

 

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