काला जल : जिसमें शानी, बस्तर और मुस्लिम आबादी का यथार्थ एक साथ मिलते हैं

काला जल : जिसमें शानी, बस्तर और मुस्लिम आबादी का यथार्थ एक साथ मिलते हैं

कभी-कभी किसी लेखक की एक ही रचना उसे अमर रखने के लिए काफी होती है. आज ही के दिन जन्मे गुलशेर खां शानी की काला जल ऐसी रचनाओं में शामिल है

कभी-कभी किसी लेखक की एक ही कृति उसे अमर रखने के लिए काफी होती है. हर बड़े लेखक के हिस्से एक ऐसी कृति जरूर होती है. जरूरी नहीं कि वह उसकी सर्वोत्तम रचना हो पर, अक्सर वह लेखक का अगला पिछला सब लीलते हुए उसकी पहचान का पर्याय हो जाती है. आज ही के दिन जन्मे दिग्गज साहित्यकार गुलशेर खां शानी की काला जल भी एक ऐसी ही रचना है.

फ्रेंच साहित्यकार और यथार्थवादी कहानी के प्रणेता माने जाने वाले मोपांसा का कहना था कि हम में से हर एक का जीवन एक उपन्यास है बशर्ते हमें अपने अनुभवों को उपन्यास में ढालना आता हो. लेकिन सच यह भी है कि अपने को रचने से ज्यादा दुष्कर कुछ और नहीं होता. वह भी बिना किसी आसक्ति और अतिरिक्त छूट के बगैर.

‘काला जल’ का नायक बब्बन जो एक तरह से इस उपन्यास का सूत्रधार भी है, कमजोर,दब्बू और बेहद भावनात्मक किरदार है. इस चरित्र से बार-बार शानी के बचपन की समानताएं खोजी जाती रही हैं और शानी ने भी इसे कुछ हद तक इसी तरह रेखांकित किया है. इसके ठीक उलट मोहसिन का किरदार सशक्त, समझदार और संभावनाशील दिखता है. स्वतंत्रता संग्राम का वाहक चरित्र और बेहद प्रखर. ये दोनों पात्र एक दूसरे के जैसे विलोम लगते हैं. इस उपन्यास की कुछ स्त्री पात्र बेहद भी सशक्त, संभावनाशील और आधुनिक हैं. जैसे लड़कों के कपड़े पहनकर बब्बन के साथ जाने का बहाना करके मोहसिन से मिलने जाती और सिगरेट फूंकती सल्लो आपा. लेकिन आखिरकार इनकी मृत्यु या फिर आत्महत्या ठीक कुछ वैसी ही लगती है जैसे बहते जल का अचानक अवरुद्ध हो जाना. जल ‘काला’ है तो इसलिए कि क्रांतिकारी व्यक्तित्व यहां बचते ही नहीं. राजेन्द्र यादव को सबसे बड़ी शिकायत इस किताब से यही थी. वे इसे शानी के किसी आगामी बड़े और महत्वपूर्ण उपन्यास की भूमिका की तरह देखते थे. लेकिन वह बड़ा उपन्यास कभी रचा ही नहीं गया. जो रचा गया वह कभी ‘वह’ नहीं हो सका.

राजेंद्र यादव ‘काला जल’ को शानी के किसी आगामी बड़े और महत्वपूर्ण उपन्यास की भूमिका की तरह देखते थे. लेकिन वह बड़ा उपन्यास कभी रचा ही नहीं गया

शानी के करीबी और मित्र रहे कांति कुमार जैन इसे शानी के भीतर के अंतर्विरोधों से जोड़कर देखते हैं. उनके अनुसार जगदलपुर या कहें तो बस्तर शानी के भीतर के रचनाकार का अक्षय पात्र था. इससे दूर होते ही वे अपनी क्रांतिकारी रचना दृष्टि से चूक गए. दिल्ली और अन्य जगहों के साथ-साथ शानी के भीतर के अंतर्विरोधों ने उस बेहद प्रतिभाशाली लेखक की हत्या कर दी. पर जैन इसका दोष शानी को न देकर उनके बचपन के दुखों और तंगियों में तलाशते हैं. यह सच भी तो है ही, असुरक्षाएं कई बार हमें खुलकर जीने और सांस लेने नहीं देती. शानी ने खुद भी स्वीकारा है, ‘लिखना मेरे लिए नितांत निजी यंत्रणाओं से मुक्ति और कुछ तंग करने वाले सवालों से जूझने का माध्यम है.’

काला जल को पढ़ते हुए लेखक के इस विचार से इत्तेफाक रखा जा सकता है. लेखक ने इस उपन्यास को कुछ ऐसे रचा है कि यह सिर्फ लेखक की अपनी कहानी न होकर, पूरे मध्यमवर्गीय मुस्लिम समुदाय और उससे भी ज्यादा सभ्य कहाये जाने वाले समाज से किसी हद तक कटे और पीछे छूटे हुए ‘बस्तर’ का रूपक बनकर उभरता है- ‘देखिये मैं बस्तर में बरसों से रह रहा हूं, सोचता था मैं सभी को समझ सकता हूं. पर नहीं वह मेरी भूल थी.लगता है लोग बस यहां सुनते हैं, समझते कुछ नहीं.’ (इसी उपन्यास से). जब हम ’स्व’ में सब को जोड़ पाते हैं तो यह किसी कृति की सबसे बड़ी सक्षमता होती है. फिर वह व्यापक और विस्तृत हो जाती है और हमें भी फैलाकर बड़ा कर देती है, कुछ विस्तार और निस्तार देती हुई.

कुछ बड़े लेखकों की नकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद ‘काला जल’ इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पहले शायद ही कभी मुस्लिम समुदाय का इतना प्रामाणिक चित्रण किसी अन्य कृति में हुआ हो. इसे किसी नैतिकता के आवरण में लपेटकर प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि जो और जैसा है उसे उसी तरह रखने की कोशिश की गई. इससे गुजरते हुए बार-बार यह लगता है कि कितनी कम पहचान रखते हैं हम इस दुनिया की. हमने कभी इसे ऐसे तो देखा ही नहीं. अगर देखा भी तो बस ऊपर-ऊपर से देखते रहे.

कुछ बड़े लेखकों की नकारात्मक टिप्पणियों के बावजूद ‘काला जल’ इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पहले शायद ही कभी मुस्लिम समुदाय का इतना प्रमाणिक चित्रण किसी अन्य कृति में हुआ हो

यह बात दीगर है कि इसके बाद और इससे पहले भी इस दुनिया से कई लेखक आये और उन्होंने हमें इन जिंदगियों के यथार्थ से गुजरने का मौका भी दिया. इनमें राही मासूम रजा, अब्दुल बिस्मिल्लाह, असगर वजाहत, मेहरुन्निसा परवेज और नासिरा शर्मा जैसे कद्दावर नाम आते हैं. पर शानी वह पहले शख्स थे जिन्होंने इसे इतनी प्रगाढ़ता से जीवंत किया. राही मासूम रजा को जिस सच को रचने के लिए एक पूरे गांव को रचने की जरुरत पड़ी, शानी ने एक परिवार के कुछ चरित्रों के माध्यम से वह बात कह दी. कहने की उनकी तरकीब बहुत आधुनिक और चौंकाऊ होने के साथ-साथ बहुत हद तक आत्मीय भी थी.

‘शब-ए-बरात’ मुस्लिमों के लिए वह दिन होता है जब वे दिवंगतों को याद करते हैं. उस दिन दीपावली की तरह उनके घर रौशन होते हैं, और सूजी और बेसन के बने हलवे से बनी मिठाई बनती है उस दिन, जिसके साथ फातेहा पढ़कर उन्हें याद किया जाता है. यह बहुत कुछ वैसा ही है, जैसे हिंदुओं में पितृपक्ष मनाया जाना. इस लिहाज से तर्पण काफी कुछ फातेहा जैसा ही है. शानी ने इसी ‘शबे बरात’ को एक उपन्यास को बुनने वाली तकनीक की तरह इस्तेमाल किया है. इसमें नायक बब्बन प्रत्येक पात्र के लिए फातेहा पढ़ते हुए उसे कहीं अपने ही भीतर जीता और याद करता है. याद किये जाने की इस प्रक्रिया में व्यक्तियों के पारस्परिक और निजी रिश्ते, मान्यताएं और अंधविश्वास और उद्वेलन वाली स्थितियां सभी एक-एक कर सामने आती जाती हैं.

बहुत ही प्रतीकात्मक ढंग से यह किताब कहीं यह भी कहती है कि दरअसल अभिशाप की काली छाया हमारे चारों तरफ है. यह परिवार तो उसका प्रतीक भर है और कोई और कैसा भी फातेहा हमें इस परिणति से मुक्ति नहीं दिला सकता. काला जल यहां दरअसल उस ठहरे हुए गंदले समाज का पर्याय है जो विकासहीन है. जिस पर अंधविश्वास और कुरीतियों की जकड़न है. यह एक शोक गीत या मर्सिये की तरह गूंजता है हमारे भीतर-अपने दंश हमारे भीतर छोड़ते हुए. यह उपन्यास एक ऐसी खिड़की भी है जिसमें झांकने पर हलचलों से भरी एक दुनिया दिखाई देती है जिसमें विशिष्ट चरित्र और उनकी जीवन गंध भरी हुई है. पर उनकी विशिष्टताएं जिंदगी लील जाती है.

काला जल यहां दरअसल उस ठहरे हुए गंदले समाज का पर्याय है जो विकासहीन है, जिस पर अंधविश्वास और कुरीतियों की जकड़न है

‘काला जल’ में शानी अपने मकड़ी के प्रतीक के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के समाज का भी बिम्ब रचते हैं, जहां लोग रह गए और चले गए के बीच में कहीं अटके हैं. जो खो दिया और जो पास है उसके बीचों बीच भटकते से. काला जल इस ‘नो मैन्स लैंड’ की भी कथा कहता है. अशफाक की 82 वर्षीय अम्मी के द्वारा वह एक ऐसे चरित्र की सर्जना करता है.जो विभाजन के बाद बड़े बेटे के साथ अपने देश रुक तो जरुर जाती है, पर उसका मन कहीं उस दूसरे बेटे में भी उलझा हुआ है. उसके सफ़ेद बालों की तुलना मकड़ी के जालों से करते हुए लेखक कहीं उस पीढ़ी के दर्द को भी रचता है, जो चुनने की स्थिति में है ही नहीं. दो अपनों के बीच, अपने ही टुकड़ों में से कोई चुने तो किसे और छोड़े तो किसे.

शानी के काला जल को पढ़ते हुए लगातार यह पंक्ति याद आती है, खूब प्याली है मगर खाली है.

ये लेख सत्याग्रह में 16 मई 2016 को प्रकाशित हुआ था

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