हलचल

शानी फ़ाउंडेशन के कार्यक्रम क से कलम में स्कूल के बच्चे हिस्सा लेते हुए

शानी फ़ाउंडेशन ने रज़ा फ़ाउंडेशन के सहयोग से दिल्ली सरकार के सरकारी स्कूलों में बच्चों में छुपे लेखक और कवि को बाहर निकालने का बीड़ा उठाया है. इसी सिलसिले में  मयूर विहार पॉकेट -4 में स्कूल के बच्चों के साथ टीचर्स ने एक आनौपचारिक बैठक की. बच्चों का उत्साह देखने लायक है.

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‘हिन्दी के मुस्लिम कथाकार ‘शानी’ के संदर्भ में निवेदिता का एक आलेख

ये किताब जब मेरे हाथ में आयी तो मैं सोच रही थी कि जिन्दगी कितनी मुक्तलिफ होती है। जब हम नहीं होते तो हमारे जीवन के टुकड़े अलग अलग शक्लों में होती है। शानी के बारे में पढ़ना वैसा ही है जैसे दुनिया के अनुभवों से अनुगुंजित होना। इस किताब में शानी के जीवन और […]

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स्त्री के सम्मान में पढ़ा गया फातिहा:‘काला जल’

‘‘औरत की खेत-खलिहान और मवेशियों की तरह हिफाजत होती थी (है)। मालिक और मल्कियत के लिए अलग-अलग उसूले-जिन्दगी बन गए। मर्द पालनहार पति और ख़ुदाए-मज़ाजी। औरत के फरायज़ मर्द की ख़िदमत कि रोज़ी-रोटी की खातिर बराहे-रास्त हवादिसे-ज़माना का मुकाबला नहीं करना पड़ता था जब तक मर्द को खुश करती। ज्यादा से ज्यादा सिपाही पैदा करती। […]

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हिन्दी साहित्य ने मुसलमानों को अनदेखा क्यों किया?

नामवर सिंह ने कभी कहा था कि हिंदी साहित्य से मुसलमान पात्र गायब हो रहे हैं। १९९० में शानी ने इसी प्रश्न को एक बातचीत के दौरान और प्रखर ढंग से पेश किया कि हिंदी साहित्य में मुसलमान पात्र थे ही कहा जो गायब होंगे। शानी का तर्क था कि तेलुगु,असमिया और बंगला के साहित्यकार […]

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आपके लोग आपको भूलेंगे नही शानी जी

‘जहाँपनाह जंगल ‘ के दरख्तों की शिनाख़्त करता जगदलपुर के आदिवासी इलाक़े से निकला एक लेखक दिल्ली आते ही अपने ख़ुद की ख़ुद्दारी की बदौलत दिल्ली को उलझन में डाल देता है। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर के उसूल पर जमा यह शख्स गुलशेर खां शानी ही हैं। शानी जी जब दिल्ली […]

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एक शाम शानी की यादों के नाम

फ़ीरोज़ शानी: डॉ. एडवर्ड जे का भारत और शानी के साथ 50 के दशक से संबंध रहा। आपने आपके पति डॉ. जे से शानी का नाम किस तरह सुना…आपके ज़हन में शानी की क्या तस्वीर उभरी थी? शेरॉन जे: एडवर्ड शानी के बारे में कुछ कह रहे हों, ऐसा कुछ मुझे याद नहीं। पहले जब […]

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