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सार्थक हस्तक्षेप करता वांग्मय का शानी अंक

रमाकान्त राय लघु पत्रिकायें निकालना बेहद चुनौती पूर्ण काम है और उनकी निरन्तरता बनाये रखना और भी कठिन। ऐसे में अलीगढ़ से निकलने वाली लघु पत्रिका वांग्मय् का निरन्तर प्रकाशित होना न सिर्फ हिन्दी के उजवल भविष्य की ओर संकेत करता है अपितु सम्पादक डॉक्टर एम फीरोज अहमद के जीवट व्यक्तित्व का परिचायक भी है। […]

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रथ देवताओं-योद्धाओं के होते हैं

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जनजीवन का दस्तावेज़ शानी की रचनाएं

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शानी को मुकम्मल स्थान नहीं मिला: साहित्यकार

शानी को मुकम्मल स्थान नहीं मिला: साहित्यकार नई दिल्ली: हिन्दी के नामचीन कथाकार गुलशेर खान शानी की जयंती पर मंगलवार (16 मई) यहां साहित्यकारों ने कहा कि उन्हें हिन्दी में वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। शानी फाउंडेशन की ओर से 16 मई को ‘शानी का साहित्य और भारतीय समाज की तस्वीर’ विषय […]

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भारतीय समजा की तस्वीर उजागर करती है शानी की लेखनी

भारतीय समजा की तस्वीर उजागर करती है शानी की लेखनी

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शानी का संसार

शानी का संसार धर्मेंद्र सुशांत शानी (1933-1995) को साहित्य-जगत में आमतौर पर ‘काला जल’ के रचनाकार के रूप में जाना जाता है। ‘काला जल’ निस्संदेह हिंदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है, लेकिन शानी का रचना-संसार यहीं तक सीमित नहीं है, जिसकी पुष्टि उनकी सद्यप्रकाशित रचनावली से होती है। छह खंडों में छपी […]

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काला जल : जिसमें शानी, बस्तर और मुस्लिम आबादी का यथार्थ एक साथ मिलते हैं

काला जल : जिसमें शानी, बस्तर और मुस्लिम आबादी का यथार्थ एक साथ मिलते हैं कभी-कभी किसी लेखक की एक ही रचना उसे अमर रखने के लिए काफी होती है. आज ही के दिन जन्मे गुलशेर खां शानी की काला जल ऐसी रचनाओं में शामिल है कभी-कभी किसी लेखक की एक ही कृति उसे अमर […]

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कभी-कभार : शानी रचनावली

कभी-कभार : शानी रचनावली अशोक बाजपेयी कथाकार-गद्यकार-संपादक शानी के देहावसान को बीस बरस से अधिक हो चुके। वे बस्तर के जगदलपुर से ग्वालियर और भोपाल, भोपाल से दिल्ली आए थे। उनका अधिकांश लेखन इन्हीं जगहों पर हुआ। उन्हें उचित ही यह क्लेश बराबर बना रहा कि वे बराबर विस्थापित होते रहे: उनका यह विस्थापन इसलिए […]

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